VARDAAN LEARNING INSTITUTE | POWERED BY VARDAAN COMET

महायज्ञ का पुरस्कार

ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 3

mahayagya ka puraskar dog

पाठ का परिचय (Introduction):

'महायज्ञ का पुरस्कार' श्री यशपाल जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक कहानी है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा महायज्ञ केवल धन या सामग्री से नहीं किया जाता, बल्कि नि:स्वार्थ भाव से जीवन में किए गए परोपकार और त्याग से होता है। कहानी में एक अत्यंत गरीब सेठ ने अपनी भूख की परवाह न करते हुए एक भूखे कुत्ते को अपनी सारी रोटियाँ खिला दीं। ईश्वर ने उनके इस दया-भाव को 'महायज्ञ' मानकर उन्हें अपार संपत्ति का पुरस्कार दिया।

1. लेखक परिचय (Author Introduction)

रचनाकार: यशपाल (Yashpal)

श्री यशपाल जी हिंदी साहित्‍य के उन प्रमुख कथाकारों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में यथार्थवाद, मार्क्सवाद और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम मिलता है। उनका जन्म 3 दिसंबर 1903 को पंजाब के फिरोजपुर छावनी में हुआ था। उनकी कहानियों में समाज के निम्न और मध्यम वर्ग की समस्याओं का सजीव चित्रण होता है।
प्रमुख रचनाएँ: झूठा सच, दादा कामरेड, देशद्रोही, पार्टी कामरेड (उपन्यास), और ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान (कहानी संग्रह)।

mahayagya divine assembly

2. प्रमुख पात्र (Character Sketch)

3. कहानी का सार (Summary)

एक समय था जब सेठ जी का बहुत बड़ा कारोबार था। उनके द्वार से कोई भी साधु-संत या गरीब खाली हाथ नहीं लौटता था। उन्होंने कई यज्ञ किए थे। लेकिन समय बदला और सेठ जी अत्यंत निर्धन हो गए। नौबत यहाँ तक आ गई कि उन्हें और उनकी पत्नी को भूखों मरने की नौबत आ गई। उन दिनों एक प्रथा थी कि लोग अपने किए गए यज्ञों का फल दूसरे को बेचकर धन प्राप्त कर लेते थे। सेठानी की सलाह पर, सेठ जी अपना एक यज्ञ बेचने के लिए कुंदनपुर के सेठ (धन्नासेठ) के पास जाने को तैयार हुए।

कुंदनपुर जाने के लिए सेठानी ने पड़ोस से आटा माँगकर सेठ जी के लिए चार मोटी रोटियाँ बना दीं। रास्ते में एक कुंज (पेड़ों का झुरमुट) और कुआँ देखकर सेठ जी ने आराम करने और भोजन करने का विचार किया। तभी उन्होंने देखा कि कुछ दूरी पर एक कुत्ता भूख से तड़प रहा है। उसकी आँखें अंदर धँस गई थीं और वह उठ भी नहीं पा रहा था।

सेठ जी का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने सोचा, "बेचारा! न जाने कितने दिनों से भूखा है।" उन्होंने अपनी एक रोटी कुत्ते को दे दी। कुत्ता उसे खाकर थोड़ा संभला। सेठ जी ने सोचा कि एक रोटी और दे दूँ तो यह चलने-फिरने लायक हो जाएगा। उन्होंने दूसरी रोटी भी खिला दी। इसी प्रकार, करुणा और निस्वार्थ भाव में उन्होंने बारी-बारी से अपनी चारों रोटियाँ कुत्ते को खिला दीं और खुद केवल पानी पीकर कुंदनपुर की ओर चल पड़े।

शाम को वे कुंदनपुर पहुँचे। धन्नासेठ की पत्नी (जिन्हें दैवीय शक्ति प्राप्त थी) ने सेठ जी से कहा, "क्या आप अपना महायज्ञ बेचेंगे?" सेठ जी हैरान रह गए क्योंकि उन्होंने वर्षों से कोई यज्ञ नहीं किया था। धन्नासेठ की पत्नी ने स्पष्ट किया कि "आज रास्ते में जो आपने भूखे कुत्ते को चारों रोटियाँ खिलाईं, वह निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही 'सच्चा महायज्ञ' है। क्या आप इसे बेचेंगे?"

सेठ जी ने इसे अपना इंसानी कर्त्तव्य (मानव धर्म) माना और उस निस्वार्थ कर्म (महायज्ञ) को पैसों के लिए बेचने से साफ़ इंकार कर दिया। वे भूखे ही वापस अपने घर लौट आए। जब उन्होंने सेठानी को सारी बात बताई, तो सेठानी को अपने पति पर बहुत गर्व हुआ। उसने भगवान को धन्यवाद दिया कि विपत्ति में भी पति का धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ।

उसी रात घर में चमत्कार हुआ। जहाँ सेठ जी सो रहे थे, वहाँ गढ्ढे से हीरों और जवाहरातों का भारी खज़ाना निकला। ईश्वर ने उनके निस्वार्थ कर्म (भूखे प्राणी की सेवा) को सबसे बड़ा महायज्ञ मानकर उन्हें यह पुरस्कार दिया था।

4. कहानी के मुख्य उद्देश्य व संदेश (Themes & Message)

mahayagya wife cooking

5. महत्वपूर्ण पंक्तियाँ और उनकी व्याख्या (Important References)

"क्या आप अपना 'महायज्ञ' बेचने आए हैं?"

प्रसंग: यह वाक्य कुंदनपुर वाले धन्नासेठ की पत्नी ने सेठ जी से तब कहा था जब सेठ जी उनके पास अपना एक साधारण यज्ञ बेचने पहुँचे थे।

व्याख्या: सेठानी ने अपनी दैवीय दृष्टि से जान लिया था कि सेठ जी ने रास्ते में भूखे कुत्ते को अपनी चारों रोटियाँ खिला दी थीं। उनके अनुसार, यह निस्वार्थ सेवा ही 'महायज्ञ' है, न कि तंत्र-मंत्र और हवन सामग्री से किया गया कोई सामान्य यज्ञ।

"मैंने कोई महायज्ञ नहीं किया, वह तो केवल प्राणी मात्र का कर्त्तव्य था। मैं उसे बेचूँगा नहीं।"

प्रसंग: सेठ जी ने यह बात धन्नासेठ और उनकी पत्नी से कही।

व्याख्या: यह सेठ जी के उच्च चरित्र और निस्वार्थ सेवा-भाव को दर्शाता है। वे किसी लाचार जीव की मदद करने को पुण्‍य कमाने या पैसे के लिए नहीं करते, बल्कि इसे एक अच्छे इंसान का सामान्य कर्त्तव्य मानते हैं। यही सच्ची आध्यात्मिकता है।

6. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: सेठ जी ने अपनी चारों रोटियाँ कुत्ते को क्यों खिला दीं?

उत्तर: रास्ते में सेठ जी ने देखा कि एक कुत्ता भूख से तड़प रहा था और उसमें उठने-बैठने की भी शक्ति नहीं थी। सेठ जी अत्यंत दयालु और परोपकारी व्यक्ति थे। करुणावश उन्होंने सोचा कि यह बेचारा कई दिनों से भूखा है। इसलिए उन्होंने अपनी एक-एक करके चारों रोटियाँ उस कुत्ते को खिला दीं ताकि उसकी जान बच सके, और स्वयं केवल पानी पीकर आगे बढ़े।


प्रश्न 2: धन्नासेठ की पत्नी (सेठानी) ने सेठ जी से कौन-सा महायज्ञ खरीदने की बात कही?

उत्तर: धन्नासेठ की पत्नी ने सेठ जी से उस महायज्ञ को खरीदने की बात कही, जो उन्होंने उसी दिन रास्ते में किया था। दरअसल, सेठ जी ने अपनी भूख की परवाह किए बिना अपनी चारों रोटियाँ एक भूखे और मरणासन्न कुत्ते को खिला दी थीं। धन्नासेठ की पत्नी के अनुसार, निस्वार्थ भाव से किया गया यह परोपकार ही 'सच्चा महायज्ञ' था।


प्रश्न 3: कहानी के शीर्षक 'महायज्ञ का पुरस्कार' की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: यह शीर्षक पूरी तरह से सार्थक है। 'महायज्ञ' का अर्थ केवल हवन सामग्री से किया जाने वाला कर्मकांड नहीं है, बल्कि प्राणी मात्र की नि:स्वार्थ सेवा ही असली 'महायज्ञ' है। सेठ जी ने अपनी चारों रोटियाँ एक भूखे कुत्ते को खिला दीं, जिसे धन्नासेठ की पत्नी ने महायज्ञ कहा। इसके बदले में ईश्वर ने अगले दिन उनके घर में हीरों का खज़ाना प्रकट करके उन्हें 'पुरस्कार' दिया। अतः यह शीर्षक कहानी के मूल भाव और संदेश को सटीक रूप से व्यक्त करता है।